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मथुरा में जन्माष्टमी | Krishna Janmasthami in Mathura

Krishna Janmasthami in Mathura

Updated Date : Thursday, 06 Aug, 2020 14:18 PM

भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रात के अंधेरे में हुआ, जिनकी भगवान विष्णु के सभी अवतारों में सबसे ज्यादा पूजा की जाती है। जन्माष्टमी वह तिथि है जिस दिन श्री कृष्ण का जन्म दिवस माना जाता है। जन्म+अष्टमी दो शब्द हैं जो संयुक्त रूप से कृष्ण जन्माष्टमी शब्द बनाते हैं। उनका जन्म हमारे हिंदू कैलेंडर के आठवें दिन रात के 12:00 बजे मथुरा की एक कालकोठरी में विष्णु के आठवें अवतार के रूप में हुआ था।

कृष्ण जन्माष्टमी विश्वव्यापी स्तर पर मनाई जाती है, हालांकि, कृष्ण जन्माष्टमी पर मथुरा और वृंदावन दो शहरों को एक जैसा देखा जा सकता है। मथुरा, अगस्त के महीने में जन्माष्टमी व मार्च के महीने में बरसाना/लठमार होली मनाने के लिए प्रसिद्ध है।

मथुरा में जन्माष्टमी विष्णु के 5000 साल पुराने अवतार की याद में मनाई जाती है, जिन्होनें दुनिया को आने वाली कई परेशानियों से बचाया। मथुरा में इस दिन लोग उपवास रखते हैं, अपने घरों को सजाते हैं और विभिन्न खाद्य पदार्थ पकाते हैं जो कि भगवान को पसंद थे। इस त्यौहार के दौरान देश के लगभग सभी हिस्सों से फूल मथुरा और वृंदावन आते हैं।

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यदि आप कृष्ण जन्माष्टमी के उत्साह, आनंद और भव्यता का अनुभव करना चाहते हैं, तो आपको मथुरा में जन्माष्टमी 2020 में भाग लेना चाहिए। इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी मंगलवार के दिन 11 अगस्त 2020 को पड़ रही है। वर्ष 2020 में मथुरा की जन्माष्टमी, यहां भगवान कृष्ण को समर्पित लगभग 400 मंदिर हैं और प्रत्येक मंदिर में वास्तविक तिथि से लगभग एक महीने पहले उत्सव शुरू हो जाता है।

जन्माष्टमी के लिए मथुरा में उत्सव को चार महत्वपूर्ण पहलुओं में विभाजित किया गया है।

1) झूलन उत्सव

2) घाट

3) दही हांडी समारोह

4) रासलीलाओं और नाटकों को उनके जन्म और बचपन की लीलाओं को याद करते हुए अभिनीत किया जाता है।

आइए हम इनमें से प्रत्येक चार पहलुओं को थोड़ा और स्पष्ट रूप से समझें।

झूलन उत्सव

मथुरा में जन्माष्टमी मुख्य रूप से दो दिन तक मनाई जाती है। पहले दिन को कृष्ण अष्टमी या गोकुल अष्टमी के रूप में जाना जाता है। त्योहार का दूसरा दिन काल अष्टमी के नाम से जाना जाता है। इन दोनों दिनों को बहुत खुशी और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

पहले दिन, लोग उपवास करते हैं जिसे वे आधी रात को भगवान के जन्म पर प्रार्थना और मंत्रों का जाप करते हुए तोड़ते हैं। उनके जन्म के बाद, लोगों को मूर्तियों को दूध, शहद, चंदन के पेस्ट और सुगंधित तेलों में भगवान को स्नान करवाना होता है। स्नान के बाद मथुरा में हर घर में लोग भगवान को नए कपड़े, एक नई बांसुरी, उनकी पगड़ी पर एक ताजा मोर पंख और बहुत सारे सोने और चांदी के आभूषणों से सजाते हैं।

इन सभी अनुष्ठानों के बाद मंदिरों में, भगवान को झूले में बिठाया जाता है, ताजा चित्रित, पत्तियों और सुगंधित फूलों से सजाया जाता है। पुजारी मंत्रों का उच्चारण करते हैं और लोगों को जन्माष्टमी के दौरान मथुरा के कृष्ण मंदिरों में झूले और भगवान के पैर छूने का मौका मिलता है। मान्यता है कि जो कोई भी झूले को छूकर जो भी प्रार्थना करता है वह निश्चित रूप से पूरी होती है।

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अगले दिन, लोग आमतौर पर दावत देते हैं, झूले के चारों ओर नाचते और गाते हुए, झूले के साथ विशेष रूप से भगवान के लिए यह उत्सव मनाते हैं। मथुरा और वृंदावन के सुंदर जन्माष्टमी समारोह में भाग लेने के लिए देश के हर कोने से लगभग आठ लाख पर्यटक आते हैं। मथुरा और वृंदावन में यह तृतीया तिथि से पूर्णिमा तक (सामान्यतः झूलन पूर्णिमा के रूप में) श्रावण मास में शुरू होता है और आठवें और नौवें दिन, लोग जन्माष्टमी मनाते हैं। तिथि एक जगह से दूसरी जगह और एक कैलेंडर से दूसरे कैलेंडर में भिन्न हो सकती है।

झूलन रासलीला श्रीकृष्ण ने राधा और दूसरी सखियों के साथ की थी।

घाट

मथुरा जन्माष्टमी 2020 को घाटों के अनुष्ठान द्वारा चिह्नित किया जाता है जो एक और उत्सव शैली है जो केवल मथुरा और वृंदावन में इस समारोह के लिए अद्वितीय है। एक विशेष रंग चुना जाता है और मंदिर में हर चीज को उसी रंग का उपयोग करके सजाया जाता है। यहां तक ​​कि श्री कृष्ण और श्री राधा की पोशाक को एक ही रंग का उपयोग करके सजाया गया है।

रंग की यह पसंद एक महीने के लिए चलती है और लगभग सभी मंदिरों में इसे निभाया जाता है। पूरे शहर को एक ही रंग में सजाया जाता है और पूरा शहर उस खास दिन वही रंग पहनता है। इसी तरह हर जन्माष्टमी पर नंदगाँव सजाया जाता था।

दही-हांडी

दही हांडी एक अनोखा उत्सव है, जो मथुरा जन्माष्टमी का एक हिस्सा है और कृष्ण के बाल रूप की याद में मनाया जाता है। हर कोई जानता है कि श्रीकृष्ण की पहली पसंद सफेद मक्खन था जो उनकी माँ अपनी रसोई में बनाती थी। पुराने दिनों में, लोग मिट्टी के बर्तनों में मक्खन संग्रहीत करते थे जो छत पर उंचे स्थान पर लटकाया जाता था।

उस समय में मक्खन एक कीमती वस्तु थी और कान्हा और उसके दोस्त एक ही बार में बहुत सारा मक्खन खाने के लिए जाने जाते थे। यह अनुष्ठान मथुरा जन्माष्टमी के दौरान मनाया जाता है जहां बर्तन में सफेद मक्खन या दही भरी जाती है गली में उंचें स्थान पर लटकाया जाता है। आमतौर पर, लोगों को हांडी तोड़ने के लिए उस तक पहुंचने के लिए एक मानव पिरामिड बनाना पड़ता है और उन लोगों पर मक्खन या दही गिरता है जो एक साथ मिलकर पिरामिड बनाते हैं।

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यह काफी महत्वपूर्ण क्षण होता है और जिस पर भी यह दही गिरता है वह खुद को वर्ष के बाकी दिनों के लिए सौभाग्यशाली मानता है।

रासलीला

रासलीला एक सुंदर पारंपरिक नृत्य है जिसमें लोग एक-दूसरे के साथ इकट्ठा होते हैं और श्रीकृष्ण के जन्म के अगले दिन अपने मन से दिन-रात नृत्य करते हैं। मथुरा जन्माष्टमी के दौरान रासलीला एक रंगीन नृत्य रूप है, जिसमें कई महिलाएँ इस नृत्य को करते हुए केंद्र में एक आदमी के पास जाती हैं।

मणिपुरी नृत्य जिसे जागोई के नाम से भी जाना जाता है, अक्सर एक ही अवधारणा में किया जाता है। पृथ्वी पर जीवन के हर रूप को बनाने और पुनः निर्मित करने वाला अनन्त नृत्य भी रासलीला के रूप में जाना जाता है और यह मथुरा जन्माष्टमी का एक हिस्सा है। रासलीला को कृष्ण की याद में मनाया जाता है, जब वह महिलाएं एक समूह में उनकी बांसुरी की धुन पर नाचती है।

पुराने ग्रंथ बताते हैं कि उन सभी संतों और ऋषियों, सिद्ध पुरूषों और तपस्वियों ने, जो कभी श्रीकृष्ण के साथ निकटता चाहते थे, इन महिलाओं के रूप में पैदा हुए थे, जो श्रीकृष्ण के पास अपनी इच्छाओं और आशीर्वाद पाने के लिए गए थे।

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर श्री कृष्ण के जीवन का संक्षिप्त विवरण

मथुरा श्री कृष्ण की भूमि, भक्ति, समाधि और तपस्या का केंद्र है।

इस त्योहार के दौरान, मथुरा जन्माष्टमी समारोहों में अधिकाधिक कथाओं का आयोजन किया जाता है।

मथुरा जन्माष्टमी समारोह के दौरान बालकृष्ण की कहानी

एक क्रूर राजा, कंश को एक अलौकिक भविष्यवाणी हुई, जिसमें कहा गया था कि उसकी मृत्यु उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान के हाथों से होगी। इसलिए कंश ने अपने साथियों को आदेश दिया कि वे हर उस बच्चे को मार दें जो देवकी के गर्भ से पैदा होगा।

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अतः नवजात शिशुओं को उनकी माता से छीन लिया गया और उन्हें निर्दयता से मार दिया गया।

जिस दिन उस बच्चे का जन्म होना था, उस दिन पूरी रात भारी बारिश हुई। बारिश की तेज आवाज के कारण नवजात शिशु की आवाज किसी को सुनाई नहीं दी। उसी समय, एक चमत्कार हुआ और सभी द्वार रहस्यमय तरीके से खुल गए। वासुदेव बच्चे को लेकर बाहर गए, उन्होनें देखा कि सभी सैनिक गहरी नींद में सोए हुए हैं। वह छिपकर रात के अंधेरे में जेल से बाहर चले गए।

उन्होंने यमुना नदी को पार किया, पानी पार करते समय पानी उनकी छाती तक आ गया अतः उन्होंने बच्चे को अपने सिर पर रखा। नदी की भारी लहरों में बच्चा फंस गया, यह देखकर वासुकी नाग (नदी का एक बड़ा सर्प) ने बच्चे को चारों ओर से कवर कर लिया। यशोदा ने भी एक बच्चे जन्म दिया। अतः वासुदेव ने कृष्ण की देखभाल के लिए उसे यशोदा दे दिया और उसके बच्चे को साथ ले गया। केवल नंद, यशोदा के पति को इस घटना के बारे में पता था और लंबे समय तक यशोमती ने कृष्ण को अपने बेटे के रूप में पाला।

अगली कहानी जिस पर बच्चे इस दिन अभिनय करते हैं,

मथुरा में जन्माष्टमी समारोह के दौरान श्रीकृष्ण के बड़े होते हुए का समय।

मथुरा जन्माष्टमी कहानी के इस भाग को भी दर्शाती है।

कृष्ण मथुरा में पले-बढ़े और एक अलौकिक बालक के रूप में जाने जाते थे। उन दिनों एक बालक के रूप में उन्होंने नंदगांव को परेशान करने वाले कई राक्षसों को मारने में अपना कौशल दिखाया था। बढ़ती उम्र के साथ, श्रीकृष्ण ने यह समझा कि प्रकृति और दुनिया में सब कुछ कैसे प्रभावित होता है। यह माना जाता है कि हम एक ऐसी धरती पर रहते हैं जहाँ एक राक्षसों की रानी माया, को श्री कृष्ण ने स्वयं परोपकार के लिए इस्तेमाल किया था। माया और मारा को केवल कृष्ण की आज्ञा के कारण पूरी दुनिया पर अधिकार करने की शक्ति मिली थी।

एक बार उन्होनें एक बालक के रूप में अपनी माँ को अपने मुंह के अंदर पूरी दुनिया दिखाई, तब उनकी मां उनके बारे में बहुत चिंतित हो गई थी।

कंस को कृष्ण ने तब मारा था जब उनकी आयु बढ़ रहीं थी। अपनी पीढ़ी पर अभिशाप के कारण, कृष्ण कभी सिंहासन पर नहीं बैठे, लेकिन उन्होंने कई राज्यों को बनाए रखने में सक्रिय रूप से रुचि ली। उन्होनें अपने जीवनकाल में कई लड़ाइयाँ लड़ीं। उन्हें महाभारत के युद्ध के अलावा कंश के ससुर, जरासंध के साथ 17 बार युद्ध करना पड़ा।

मथुरा जन्माष्टमी के दौरान श्रीकृष्ण के जन्म को उनकी उपस्थिति को याद करते हुए मनाया जाता है।

इस मुश्किल समय के दौरान, बलाराम ने पूरे राज्य को वर्तमान उत्तर प्रदेश से गुजरात के द्वारका में स्थानांतरित कर दिया, जहां उनकी मृत्यु हो गई, जब एक शिकारी ने एक हिरण पर तीर का निशाना साधा जो गलती से श्री कृष्ण को लग गया। पांचाल देश के राजा की बेटी पांचाली ने उन्हें इस तरह की मौत का शाप दिया था जो सच हो गया और उसकी मृत्यु वास्तव में इस दुनिया में कलियुग ले आई।

हर एक दानव को उन्होनें मारा और हर एक प्राणी उन्हें इस दिन प्रभु की स्तुति करने के लिए याद करता है।

वह में मथुरा लंबे समय तक रहे, अतः निश्चित रूप से जन्माष्टमी का त्योहार मनाने का प्रथम स्थान मथुरा है।

मथुरा जन्माष्टमी 2020

कोविड-19 के कारण मथुरा जन्माष्टमी 2020 के लिए यूपी सरकार द्वारा कोई संदेश जारी नहीं किया गया है।

हालांकि, पिछले साल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जन्माष्टमी के लिए लगभग पंद्रह दिवसीय त्योहार का आयोजन किया था। पिछले साल इस त्योहार के दौरान अभिनय करने के लिए देश के सभी हिस्सों से नर्तक और गायक आए थे।

फूल, संगीत मुख्य रूप से बांसुरी, नृत्य और बहुत सारे व्यंजनों के साथ प्रार्थना करना, मथुरा जन्माष्टमी में इस त्योहार को दर्शाता है। इस दिन भगवान को 56 पकवान चढ़ाए जाते हैं और रात के 12ः00 बजे श्रीकृष्ण जन्म के बाद भक्त इस भोजन से अपना उपवास तोड़ते हैं।

मथुरा जन्माष्टमी के लिए अंतरिक शब्द

हरे राम, हरे राम, राम, राम हरे हरे।

हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

ऐसा माना जाता है कि कृष्ण रामेश्वरम में स्नान करते हैं, बद्रीनाथ में प्रार्थना करते हैं, द्वारका में सोते हैं, पुरी में भोजन करते हैं और मथुरा और वृंदावन में कपड़े पहनते हैं।

अतः, अगर इस जन्माष्टमी नहीं, लेकिन आगामी कुछ वर्षों में इस भव्य उत्सव का हिस्सा बनने की कोशिश करें जो किसी के जीवन और जीवन को जीने की याद दिलाता है। हालाँकि, यात्रा कठिन है, परंतु हमें आशा नहीं खोनी चाहिए, जो हमारे दिलों में प्रसन्न करती है।

यहाँ देखे बरसाना लठमार होली

इस बार कृष्ण जन्माष्टमी अपने घरों में मनाते हैं परंतु अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार मथुरा जन्माष्टमी का हिस्सा बनना नहीं भूलें। यह समय और प्रयास से है, और आप इसे हर तरह से पसंद करेंगे।


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